श्री शिव महापुराण
श्रीउमा संहिता (प्रथम खंड)
(उन्तालीसवां अध्याय)
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वैवस्वत वंशीय राजाओं का वर्णन… (भाग 1)

शौनक जी पूछने लगे, हे सूत जी! आपने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के बारे में बताया। अब कृपा करके यह बताइए कि उनके साठ हजार पुत्र किस प्रकार हुए। शौनक जी के प्रश्न का उत्तर देते हुए सूत जी बोले, ‘हे मुनिवर! सगर की दो पत्नियां थीं।
उनकी पहली पत्नी ने ऋषि और्व से साठ हजार पुत्रों का वरदान मांगा था। वरदान को सिद्ध करते हुए उनके साठ हजार पुत्र हुए। रानी ने उन पुत्रों को मटकों में रख दिया। कुछ समय के पश्चात वे बलवान होकर बाहर निकल आए।
ये साठ हजार पुत्र ही कपिल मुनि की क्रोधाग्नि से भस्म हो गए थे। दूसरी रानी ने वरदान में एक वंश वृद्धि करने वाला सुंदर पराक्रमी पुत्र ही मांगा था।
इन साठ हजार भस्म हुए राजपुत्रों का उद्धार करना अति आवश्यक था। इसी सगर वंश में राजा दिलीप भी हुए। उन्हीं के पुत्र भगीरथ ने अपने पूर्वजों का उद्धार करने के लिए श्री गंगाजी को स्वर्ग से धरती पर बुलाया था।
अपने पूर्वजों का उद्धार करके श्री गंगाजी को उन्होंने अपनी पुत्री बनाया। इसलिए वे भागीरथी नाम से जगप्रसिद्ध हुईं।
भागीरथी का पुत्र श्रुतिसेन, उनका पुत्र नाभाग, नाभाग का अंबरीष, उनका सिंधुदीप, उसका आयुताजि, आयुताजि का ऋतुपर्ण, उसका अण्पर्ण, उसका मित्रसह, उसका सर्वकर्मा, सर्वकर्मा का अनरण्य, अनरण्य का मुडिद्रुह, उसका निषध और निषध का खट्वांग, खट्वांग का दीर्घबाहु, दीर्घबाहु का दिलीप, दिलीप का रघु, रघु का अज, उसका दशरथ एवं दशरथ के पुत्र के रूप में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म हुआ।
श्रीराम के पुत्रों के रूप में लव-कुश का जन्म हुआ। इस प्रकार वैवस्वत वंश आगे बढ़ता रहा। इक्ष्वाकु जो कि धर्मात्मा और पुण्यात्मा माने जाते थे, उनका वंश सुमित्र राजा तक चला।
क्रमशः शेष अगले अंक में…


